“उमर खालिद की किताब पर बवाल! वेन्यू रद्द होने के बाद बाहर जुटे छात्र, जमकर हुआ विरोध”
उमर खालिद की किताब पर विवाद, JNU में चर्चा का कार्यक्रम रद्द होने के बाद बाहर हुआ आयोजन
नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में पूर्व छात्र नेता और शोधकर्ता उमर खालिद की किताब को लेकर एक बार फिर विवाद सामने आया है। विश्वविद्यालय परिसर में उनकी किताब पर चर्चा के लिए प्रस्तावित कार्यक्रम को प्रशासन ने कार्यक्रम की पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराए जाने का हवाला देते हुए रद्द कर दिया। इसके बाद छात्रों ने परिसर के बाहर चर्चा आयोजित की, जहां विरोध भी देखने को मिला।
उमर खालिद की कौन सी किताब है चर्चा में?
उमर खालिद की पहली पुस्तक का नाम “Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power” है। यह किताब उनके JNU में किए गए पीएचडी शोध पर आधारित है और 27 जून 2026 को Juggernaut से प्रकाशित हुई। करीब 400 पन्नों की इस पुस्तक में झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासी समाजों के इतिहास, सत्ता और सामाजिक संरचनाओं का अध्ययन किया गया है।
खालिद ने जुलाई 2018 में JNU के Centre for Historical Studies में अपनी पीएचडी थीसिस जमा की थी। अब उसी शोध को संशोधित रूप में पुस्तक के तौर पर प्रकाशित किया गया है। पुस्तक की प्रस्तावना इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखी है, जबकि समाजशास्त्री नंदिनी सुंदर का afterword भी इसमें शामिल है।
किताब में क्या है?
“Fractured Communities” का मुख्य फोकस सिंहभूम के आदिवासी समुदायों के इतिहास पर है। पुस्तक में औपनिवेशिक दौर में आदिवासी समाज, जमीन, सत्ता और स्थानीय सामाजिक संरचनाओं के बीच संबंधों को समझने की कोशिश की गई है।
किताब का उद्देश्य आदिवासी समाज को एक जैसी और स्थिर पहचान के रूप में देखने के बजाय उनके भीतर मौजूद अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक अनुभवों को सामने लाना है। पुस्तक को लेकर प्रकाशित समीक्षाओं में भी इसके ऐतिहासिक शोध और आदिवासी समुदायों की राजनीतिक भूमिका पर चर्चा की गई है।
जेल में रहते हुए किताब पर चर्चा क्यों अहम?
उमर खालिद की पुस्तक ऐसे समय प्रकाशित हुई है जब वह 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े बड़े षड्यंत्र मामले में UAPA के तहत जेल में हैं और उनके खिलाफ मुकदमा अभी लंबित है। खालिद आरोपों से इनकार करते रहे हैं। उनकी जमानत याचिकाओं पर भी अदालतों में सुनवाई होती रही है। जुलाई 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा था और अगली सुनवाई 27 अगस्त के लिए तय की गई थी।
ऐसे में उनकी किताब का प्रकाशन केवल साहित्यिक या अकादमिक विषय नहीं रह गया है, बल्कि इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विश्वविद्यालयों में बहस और राजनीतिक विचारों को लेकर भी बहस को जन्म दिया है।
JNU में कार्यक्रम क्यों हुआ रद्द?
हालिया विवाद उस समय सामने आया जब JNU में उमर खालिद की किताब पर चर्चा के लिए छात्र संगठनों की ओर से कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी की गई थी। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कार्यक्रम की अनुमति रद्द करते हुए कहा कि आयोजकों की ओर से कार्यक्रम से जुड़ी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रशासन को कार्यक्रम के संबंध में पर्याप्त विवरण नहीं मिला था और इसी आधार पर अनुमति नहीं दी गई।
कार्यक्रम रद्द होने के बावजूद छात्रों ने चर्चा को पूरी तरह समाप्त नहीं किया। बाद में कार्यक्रम को वैकल्पिक स्थान पर आयोजित किया गया। इस दौरान ABVP से जुड़े छात्रों के विरोध और नारेबाजी की भी खबर सामने आई।
किताब पर राजनीतिक बहस भी तेज
उमर खालिद का नाम लंबे समय से भारतीय राजनीति और छात्र आंदोलनों से जुड़े विवादों में रहा है। इसलिए उनकी किताब को लेकर होने वाली किसी भी सार्वजनिक चर्चा का राजनीतिक प्रभाव भी दिखाई देता है।
इससे पहले अप्रैल 2026 में बेंगलुरु में “Umar Khalid and His World” नामक एक अलग पुस्तक/संकलन पर कार्यक्रम को लेकर भी विवाद हुआ था। BJP ने पुलिस से कार्यक्रम रोकने की मांग की थी। उस कार्यक्रम में इतिहासकार रामचंद्र गुहा और अभिनेता प्रकाश राज सहित कई वक्ताओं के शामिल होने की जानकारी सामने आई थी।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि “Umar Khalid and His World” उमर खालिद की अपनी किताब नहीं, बल्कि उनके लेखन और उनके बारे में लिखे गए लेखों का एक संकलन है, जबकि “Fractured Communities” उमर खालिद की अपनी पुस्तक है।
उमर खालिद ने अपनी किताब को लेकर क्या कहा?
जुलाई 2026 में प्रकाशित एक लेख में उमर खालिद ने अपनी पीएचडी थीसिस को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किए जाने पर विचार साझा किए। उन्होंने लिखा कि यह शोध असाधारण परिस्थितियों में तैयार हुआ था और उनके लिए इसका प्रकाशन उत्साह के साथ-साथ चिंता का विषय भी है। उन्होंने इसे शोध, इतिहास और सत्ता के प्रभाव को समझने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया।
उनके अनुसार, यह शोध केवल अकादमिक डिग्री हासिल करने की कवायद नहीं थी, बल्कि इतिहास को अलग नजरिए से देखने की कोशिश भी थी। पुस्तक में सिंहभूम के आदिवासी समाजों के इतिहास और औपनिवेशिक शासन के दौरान सत्ता-संबंधों को प्रमुखता दी गई है।
क्या यह सिर्फ किताब का विवाद है?
पूरे मामले को केवल किताब के प्रकाशन तक सीमित करके देखना आसान नहीं है। एक तरफ पुस्तक को अकादमिक शोध के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ लेखक की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनके खिलाफ चल रहे मामले के कारण इसके सार्वजनिक कार्यक्रमों पर राजनीतिक नजर भी बनी हुई है।
JNU में कार्यक्रम रद्द होने के बाद बाहर चर्चा आयोजित होना और वहां विरोध प्रदर्शन होना बताता है कि विश्वविद्यालय परिसर में राजनीतिक विचारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रशासनिक अनुमति को लेकर बहस अभी भी संवेदनशील बनी हुई है।
निष्कर्ष
उमर खालिद की “Fractured Communities” फिलहाल देश की चर्चित पुस्तकों में शामिल हो गई है। इसकी वजह केवल इसका विषय नहीं, बल्कि लेखक की राजनीतिक और कानूनी पृष्ठभूमि भी है।
JNU में पुस्तक पर चर्चा का कार्यक्रम रद्द होने के बाद पैदा हुआ विवाद एक बार फिर यह सवाल सामने लाता है कि विश्वविद्यालयों में संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर बहस की सीमा क्या होनी चाहिए और प्रशासनिक अनुमति की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होनी चाहिए।
फिलहाल किताब का केंद्र सिंहभूम के आदिवासी समाज और उनके इतिहास पर है, लेकिन इसके इर्द-गिर्द चल रही बहस ने इसे एक व्यापक राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बना दिया है। इस पूरे मामले में अलग-अलग पक्षों के दावों को अलग रखते हुए तथ्यात्मक स्थिति को सामने रखना जरूरी है।
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