होर्मुज से परमाणु कार्यक्रम तक टकराव, ईरान-अमेरिका समझौते की समयसीमा हुई खत्म
ईरान-अमेरिका सीजफायर की समयसीमा खत्म, तनाव बढ़ने का खतरा; परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज पर टकराव जारी
तेहरान/वॉशिंगटन। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने की कोशिशों को सोमवार को बड़ा झटका लगा है। दोनों देशों के बीच जून में हुए अंतरिम समझौते के तहत तय 60 दिनों की समयसीमा 17 अगस्त 2026 को समाप्त हो गई, लेकिन स्थायी शांति समझौते को लेकर कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया। बातचीत में प्रमुख मुद्दों पर मतभेद बने रहने के कारण पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
समझौते का मकसद क्या था?
जून में हुए समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव को कम करना, बातचीत का रास्ता खोलना और महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को सामान्य बनाना था। इसके साथ ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर आगे की बातचीत का रास्ता तैयार किया गया था।
हालांकि, समझौते के बाद भी दोनों पक्षों के बीच अविश्वास कम नहीं हुआ। अमेरिका और ईरान एक-दूसरे पर समझौते की शर्तों का उल्लंघन करने के आरोप लगाते रहे हैं।
बातचीत में क्यों नहीं बनी सहमति?
इस पूरे विवाद में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे अहम मुद्दों में से एक बना हुआ है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच इस बात को लेकर मतभेद हैं कि इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही किस तरह और किन शर्तों के तहत होनी चाहिए।
इसके अलावा ईरान अमेरिका से प्रतिबंधों में राहत और अन्य आर्थिक कदमों की मांग कर रहा है, जबकि अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर ठोस आश्वासन चाहता है।
क्या फिर शुरू हो सकता है सैन्य तनाव?
सीजफायर की समयसीमा समाप्त होने के बाद सबसे बड़ी चिंता यही है कि दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव दोबारा बढ़ सकता है। हालांकि, सीजफायर की समयसीमा खत्म होना अपने आप में तत्काल युद्ध शुरू होने की पुष्टि नहीं करता। फिलहाल कूटनीतिक प्रयासों और मध्यस्थों के जरिए बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी है।
क्षेत्र में पहले से मौजूद सैन्य तनाव और समुद्री मार्गों पर अस्थिरता के कारण किसी भी नए घटनाक्रम का असर पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ सकता है।
तेल और वैश्विक बाजार पर भी नजर
ईरान-अमेरिका तनाव का असर सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी किसी भी बड़ी बाधा का प्रभाव कच्चे तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है। बाजार पहले से ही इस आशंका पर नजर रख रहे हैं कि क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
भारत समेत एशिया के कई देशों के लिए भी पश्चिम एशिया की स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर किसी भी बड़े व्यवधान का असर अर्थव्यवस्था और परिवहन लागत पर पड़ सकता है।
आगे क्या होगा?
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि अमेरिका और ईरान आगे बातचीत का रास्ता चुनते हैं या तनाव और बढ़ता है। मध्यस्थ देशों की कोशिश है कि दोनों पक्षों को फिर से वार्ता की मेज पर लाया जाए और किसी नए समझौते की दिशा में आगे बढ़ा जाए।
फिलहाल स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। स्थायी शांति समझौते की दिशा में प्रगति नहीं होने और 60 दिन की समयसीमा समाप्त होने के बाद पश्चिम एशिया में नई अनिश्चितता पैदा हो गई है।
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