नेपाल में तबाही का सैलाब! ग्लेशियर टूटते ही मचा हाहाकार, पानी और मलबे ने मचाई भारी तबाही
नेपाल में कुदरत का कहर! ग्लेशियर टूटने के बाद आई विनाशकारी बाढ़, तबाही के मंजर ने दुनिया को हिलाया
काठमांडू। नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में बुधवार को आई विनाशकारी बाढ़ ने कई इलाकों में भारी तबाही मचा दी। पानी के साथ मलबा, पत्थर और बर्फ का सैलाब इतनी तेजी से नीचे की ओर आया कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे इलाकों में कई घर, सड़कें, पुल और दूसरी महत्वपूर्ण संरचनाएं इसकी चपेट में आ गईं।
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक यह आपदा एक बड़े ग्लेशियर और चट्टानी हिस्से के टूटने के बाद अचानक आई बाढ़ से जुड़ी है। शुरुआती घंटों में भूकंप को संभावित वजह माना जा रहा था, लेकिन बाद की जांच में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने और उससे पैदा हुए मलबे के बहाव को प्रमुख कारण माना गया।
अचानक आया पानी और मलबे का सैलाब
बताया जा रहा है कि हिमालय के ऊपरी हिस्से में बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा नदी क्षेत्र में आ गिरा। इससे पानी का बहाव अचानक रुकने और फिर बेहद तेज गति से नीचे की ओर आने की स्थिति बनी। कुछ ही समय में नदी का जलस्तर कई मीटर तक बढ़ गया और उसके साथ मिट्टी, चट्टान तथा बर्फ का भारी मलबा बहने लगा।
पहाड़ी इलाकों की संकरी घाटियों में इस तेज बहाव ने तबाही को और बढ़ा दिया। जहां लोग सामान्य दिन की तरह अपने काम में लगे थे, वहीं कुछ ही देर में उनके सामने पानी और मलबे की दीवार जैसी स्थिति पैदा हो गई।
कई इलाकों में बर्बादी का मंजर
आपदा की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद तबाही का अंदाजा लगाया जा सकता है। कई जगह सड़कें पूरी तरह मलबे में बदल गईं, पुल बह गए और संपर्क मार्ग टूट गए। बिजली और संचार व्यवस्था भी प्रभावित हुई है।
नेपाल के रासुवा क्षेत्र सहित सीमा से जुड़े इलाकों में बाढ़ का असर बेहद गंभीर बताया जा रहा है। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी भारी नुकसान हुआ है। प्रमुख सीमा व्यापार मार्ग और आसपास के इलाके भी इस प्राकृतिक आपदा से प्रभावित हुए हैं।
सैकड़ों लोगों की मौत और बड़ी संख्या में लोग लापता
इस आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि सैकड़ों लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। अलग-अलग समय पर जारी रिपोर्टों में मृतकों और लापता लोगों की संख्या अलग-अलग है और राहत-बचाव अभियान जारी रहने के कारण आंकड़ा लगातार बदल रहा है।
लापता लोगों में स्थानीय नागरिकों के अलावा बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक और तीर्थयात्री भी शामिल बताए जा रहे हैं। कई लोग हिमालयी क्षेत्रों की यात्रा या धार्मिक यात्रा पर थे। यही वजह है कि नेपाल के साथ-साथ कई दूसरे देशों की सरकारें भी अपने नागरिकों की जानकारी जुटाने में लगी हैं।
कई किलोमीटर तक फैला तबाही का असर
बाढ़ का पानी और मलबा सिर्फ नदी के आसपास तक सीमित नहीं रहा। तेज बहाव ने अपने रास्ते में आने वाली कई संरचनाओं को नुकसान पहुंचाया। सड़कें कट जाने और पुलों के बह जाने से कई इलाकों तक राहत दलों की पहुंच मुश्किल हो गई है।
हवाई रास्ते से राहत और बचाव कार्य चलाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन खराब मौसम और पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियां अभियान में बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। नेपाल की सेना और अन्य बचाव दल प्रभावित इलाकों में लोगों को सुरक्षित निकालने में जुटे हैं।
यात्रियों और तीर्थयात्रियों की चिंता बढ़ी
इस हादसे ने उन परिवारों की चिंता भी बढ़ा दी है जिनके अपने लोग नेपाल और तिब्बत के हिमालयी इलाकों में यात्रा पर गए थे। रिपोर्टों में कई देशों के नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
कुछ लोग कैलाश मानसरोवर क्षेत्र की यात्रा से जुड़े थे, जबकि कई पर्यटक और कामगार भी प्रभावित क्षेत्र में मौजूद थे। संचार व्यवस्था बाधित होने की वजह से कई परिवारों को अपने परिजनों की जानकारी मिलने में परेशानी हो रही है।
सैटेलाइट तस्वीरों ने दिखाई तबाही की असली तस्वीर
आपदा के बाद सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों ने भी इस प्राकृतिक घटना की भयावहता को उजागर किया है। जिन पहाड़ी ढलानों पर पहले हरियाली दिखाई देती थी, वहां अब बड़े हिस्से में मलबा और गाद नजर आ रही है।
विशेषज्ञ इन तस्वीरों और अन्य वैज्ञानिक आंकड़ों की मदद से यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ग्लेशियर टूटने की घटना किस तरह शुरू हुई और पानी तथा मलबे का बहाव कितनी तेजी से नीचे की ओर पहुंचा।
क्या जलवायु परिवर्तन भी है बड़ी वजह?
हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता को लेकर वैज्ञानिक लंबे समय से चिंता जताते रहे हैं। ताजा आपदा के बाद भी विशेषज्ञ इस घटना और बदलते जलवायु परिस्थितियों के बीच संभावित संबंधों का अध्ययन कर रहे हैं।
हालांकि किसी एक घटना के लिए जलवायु परिवर्तन को तत्काल एकमात्र कारण बताना उचित नहीं होगा, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते तापमान से ग्लेशियरों और पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिरता पर असर पड़ सकता है। इससे भविष्य में ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।
राहत और बचाव अभियान जारी
नेपाल में प्रशासन, सेना और बचाव दल प्रभावित क्षेत्रों में लगातार काम कर रहे हैं। प्राथमिकता उन लोगों को सुरक्षित निकालना है जो बाढ़ और मलबे के बीच फंसे हो सकते हैं। इसके साथ ही लापता लोगों की तलाश, घायलों को चिकित्सा सहायता और जरूरी सामान पहुंचाने का काम भी किया जा रहा है।
लेकिन टूटी सड़कों, क्षतिग्रस्त पुलों और कठिन पहाड़ी रास्तों के कारण बचाव अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। कई इलाकों में संचार व्यवस्था बहाल करना भी राहत कार्यों का अहम हिस्सा है।
नेपाल की इस त्रासदी ने दुनिया को चेताया
हिमालय को दुनिया की सबसे संवेदनशील पर्वतीय प्रणालियों में गिना जाता है। यहां ग्लेशियर, बर्फ, चट्टान और नदियों की प्राकृतिक गतिविधियां एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं। ऐसे में किसी एक हिस्से में अचानक बदलाव नीचे बसे इलाकों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
नेपाल की मौजूदा त्रासदी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि हिमालयी क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम, ग्लेशियरों की निगरानी, सुरक्षित निर्माण और आपदा प्रबंधन को कितना मजबूत किया जाना चाहिए।
फिलहाल नेपाल में राहत और बचाव अभियान जारी है। मलबे के नीचे फंसे लोगों की तलाश की जा रही है और लापता लोगों के परिवार अपनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं। जैसे-जैसे बचाव दल दुर्गम इलाकों तक पहुंचेंगे, इस आपदा से हुए नुकसान की वास्तविक तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।
PC News अपडेट: नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई इस आपदा में मृतकों और लापता लोगों के आंकड़े राहत एवं बचाव अभियान के साथ लगातार बदल रहे हैं। इसलिए प्रकाशित आंकड़ों को अंतिम आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। प्रशासन और राहत एजेंसियों की ओर से नए आंकड़े सामने आने पर खबर को अपडेट किया जाएगा।
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