Nepal Flood Disaster: हिमालयी बाढ़ में 1,000 से ज्यादा मौतें, 4,400 से अधिक लापता; Rescue Operation जारी
ग्लेशियर ढहने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल और चीन के सीमावर्ती इलाकों को झकझोर दिया; गांव, सड़कें, पुल और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट तबाह, हजारों परिवार अपनों की तलाश में
काठमांडू। नेपाल और चीन के हिमालयी क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे इलाके को गहरे संकट में डाल दिया है। 26 अगस्त से शुरू हुई इस आपदा में नेपाल और चीन को मिलाकर मौतों का आंकड़ा 1,000 के पार पहुंच गया है, जबकि हजारों लोग अभी भी लापता हैं। नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसी के अनुसार देश में 987 मौतें दर्ज की गई थीं और 3,916 लोग लापता बताए गए हैं; चीन की ओर से 16 मौतों और 546 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई है।
हालांकि अलग-अलग अपडेट में आंकड़ों में बदलाव हो रहा है क्योंकि दुर्गम पहाड़ी इलाकों तक राहत दलों की पहुंच अभी भी सीमित है। मलबे, कीचड़ और टूटे रास्तों के बीच राहतकर्मी लगातार शवों और जीवित बचे लोगों की तलाश कर रहे हैं।
ग्लेशियर ढहने के बाद मची तबाही
इस विनाशकारी आपदा की शुरुआत हिमालय में ग्लेशियर और चट्टानी संरचना के ढहने से हुई। बड़ी मात्रा में बर्फ, चट्टान और पानी अचानक नीचे की घाटियों की ओर आया और देखते ही देखते तेज बहाव वाली बाढ़ में बदल गया। पानी और मलबे की रफ्तार इतनी तेज थी कि कई इलाकों में लोगों को संभलने या सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का पर्याप्त समय तक नहीं मिला। बाढ़ ने नदी घाटियों में बसे गांवों, बाजारों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है।
हजारों लोग अभी भी लापता
इस आपदा का सबसे दर्दनाक पहलू बड़ी संख्या में लोगों का लापता होना है। नेपाल में 3,916 लोग लापता बताए गए हैं, जबकि चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी सैकड़ों लोगों का पता नहीं चल पाया है। दोनों देशों के आंकड़े जोड़ने पर लापता लोगों की संख्या 4,400 से ज्यादा पहुंचती है। लापता लोगों में स्थानीय नागरिकों के अलावा विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। नेपाल के आंकड़ों में 583 विदेशी नागरिकों के लापता होने की जानकारी दी गई है। परिवार अस्पतालों और अस्थायी राहत केंद्रों में अपनों को तलाश रहे हैं। कई शवों की पहचान अभी बाकी है, जिसके लिए अधिकारियों ने परिजनों से DNA और अन्य पहचान संबंधी जानकारी जुटाने की प्रक्रिया शुरू की है।
हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बने सबसे बड़ी चुनौती
नेपाल में तेजी से बढ़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट इस आपदा की चपेट में बुरी तरह आए हैं। कई परियोजनाओं के सुरंग क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कर्मचारी फंसने की आशंका है। अधिकारियों के अनुसार शुरुआत में हाइड्रोपावर परियोजनाओं से जुड़े 900 से ज्यादा लोग लापता बताए गए थे। रेस्क्यू टीमों के लिए सबसे मुश्किल काम सुरंगों तक पहुंचना है, क्योंकि कई जगहों पर पानी, चट्टान और कीचड़ ने प्रवेश मार्ग बंद कर दिए हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री Balendra Shah के अनुसार हाइड्रोपावर परियोजनाओं से अब तक 279 कर्मचारियों को बचाया जा चुका है।
11 हजार से ज्यादा लोगों को बचाया गया
मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद नेपाल में राहत एवं बचाव अभियान लगातार जारी है। अधिकारियों के मुताबिक 11,000 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। हेलिकॉप्टर, भारी मशीनरी, खोजी दल और सेना की टीमें प्रभावित क्षेत्रों में काम कर रही हैं। जहां सड़कें और पुल टूट गए हैं, वहां राहत सामग्री पहुंचाने के लिए अस्थायी रास्ते और पुल तैयार किए जा रहे हैं। नेपाल के सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक Nuwakot तक सड़क संपर्क बहाल करने के प्रयास भी किए गए हैं, जिससे राहत सामग्री और बचाव दलों की आवाजाही आसान हो सके।
सड़कें, पुल और गांव मलबे में तब्दील
बाढ़ ने सिर्फ लोगों की जान ही नहीं ली, बल्कि बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचाया है। कई सड़कें बह गईं, पुल टूट गए और नदी किनारे बसे इलाकों में घर तथा दुकानें मलबे में बदल गईं। कई प्रभावित क्षेत्रों में संचार और बिजली व्यवस्था भी बाधित हुई। कुछ इलाकों में बिजली और communication lines को दोबारा बहाल करने का काम शुरू हो चुका है।
भारत और चीन भी राहत में जुटे
आपदा के बाद नेपाल की मदद के लिए पड़ोसी देश भी आगे आए हैं। भारत और चीन राहत एवं बचाव प्रयासों में सहयोग कर रहे हैं। दुर्गम इलाकों तक पहुंच बनाने के लिए अस्थायी Bailey bridges तैयार किए जा रहे हैं। इससे उन क्षेत्रों तक पहुंचना संभव हो रहा है जहां बाढ़ और भूस्खलन के कारण पुराने रास्ते पूरी तरह कट गए थे।
42 मिलियन डॉलर से ज्यादा की अंतरराष्ट्रीय मदद
नेपाल के प्रधानमंत्री के अनुसार आपदा के बाद 42 मिलियन डॉलर से ज्यादा की सहायता का योगदान सामने आ चुका है। कई देश राहत सामग्री, विशेषज्ञ दल और बचाव उपकरण उपलब्ध करा रहे हैं। नेपाल के सामने अब केवल लोगों को बचाने की चुनौती नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों को दोबारा बसाने, सड़क-पुल बहाल करने और बिजली-संचार व्यवस्था खड़ी करने की भी बड़ी जिम्मेदारी है।
मलबे में अपनों की तलाश
प्रभावित क्षेत्रों में सबसे दर्दनाक तस्वीर उन परिवारों की है जो मलबे में अपने रिश्तेदारों को तलाश रहे हैं। कई स्थानों पर भारी मशीनों से कीचड़ और चट्टानों को हटाया जा रहा है। कुछ इलाकों में रात के समय भी रोशनी के बीच search operation चलाया जा रहा है।
हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे लोगों को निकालना विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वहां पानी और मलबे के कारण रेस्क्यू टीमों की गति बेहद धीमी हो रही है।
क्या जलवायु परिवर्तन भी है बड़ी वजह?
इस आपदा ने हिमालय में बदलते मौसम और ग्लेशियरों की अस्थिरता को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों में बदलाव से हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि किसी एक प्राकृतिक आपदा को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन विशेषज्ञ हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर instability और extreme weather events को लेकर बढ़ती चिंता जरूर जता रहे हैं।
नेपाल के सामने अब दोहरी चुनौती
फिलहाल नेपाल के सामने सबसे पहली प्राथमिकता लापता लोगों की तलाश और घायलों का इलाज है। इसके बाद प्रभावित परिवारों को भोजन, पानी, दवाइयां और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती होगी। लंबे समय में सड़क, पुल, बिजली, संचार और हाइड्रोपावर infrastructure को दोबारा खड़ा करने के लिए बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण की जरूरत पड़ेगी।
PC NEWS का निष्कर्ष
नेपाल और चीन के हिमालयी क्षेत्र में आई बाढ़ ने हजारों परिवारों की जिंदगी बदल दी है। ग्लेशियर और चट्टानी संरचना के ढहने के बाद शुरू हुई इस आपदा ने कुछ ही दिनों में गांवों, सड़कों, पुलों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया।
नेपाल और चीन को मिलाकर मौतों का आंकड़ा 1,000 के पार पहुंच चुका है, जबकि 4,400 से ज्यादा लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, लेकिन दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में रेस्क्यू ऑपरेशन अभी भी जारी है। अब सबसे बड़ी उम्मीद उन लोगों को बचाने पर टिकी है जो अभी भी मलबे, सुरंगों और कटे हुए इलाकों में फंसे हो सकते हैं।
यह सिर्फ नेपाल की त्रासदी नहीं, पूरे हिमालय के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
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