“आजाद भारत में भी अधूरी आजादी की कहानी! हरियाणा के रोहनात गांव ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी थी जंग, जमीन छिनी तो दशकों तक नहीं फहराया तिरंगा”



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रोहनात: हरियाणा का वह गांव, जिसकी आजादी की कहानी आज भी अधूरी मानी जाती है

भिवानी, हरियाणा: भारत को आजाद हुए करीब आठ दशक बीत चुके हैं, लेकिन हरियाणा के रोहनात गांव का इतिहास आज भी 1857 की उस क्रांति की याद दिलाता है, जब अंग्रेजी हुकूमत ने विद्रोह की सजा पूरे गांव को दी थी। गांव के लोगों का संघर्ष केवल अंग्रेजों के अत्याचार की कहानी नहीं है, बल्कि जमीन और सम्मान के अधिकार के लिए पीढ़ियों से चली आ रही लड़ाई की कहानी भी है।

1857 में अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था गांव

रोहनात के ग्रामीणों ने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजी शासन का विरोध किया था। विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, क्षेत्र के विद्रोहियों ने हिसार और हांसी में अंग्रेजी प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई की। इसके बाद अंग्रेजों ने रोहनात को “Village of Rebels” यानी “बागियों का गांव” घोषित कर दिया।इसके बाद गांव पर अंग्रेजी सेना ने कठोर कार्रवाई की। कई लोगों को फांसी दी गई और कुछ लोगों को हांसी ले जाकर रोड रोलर से कुचल दिए जाने की घटनाओं का उल्लेख ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। हांसी की जिस सड़क से यह घटना जुड़ी बताई जाती है, उसे आज भी “लाल सड़क” के नाम से जाना जाता है।

जमीन छीनकर कर दी गई नीलामी

रोहनात के इतिहास का सबसे बड़ा दर्द गांव की जमीन से जुड़ा है। उपलब्ध रिकॉर्ड और रिपोर्टों के अनुसार, 1858 में अंग्रेजों ने गांव की बड़ी मात्रा में जमीन नीलाम कर दी। एक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 4,315 एकड़ जमीन महज 8,100 रुपये में बेची गई थी।ग्रामीणों का कहना रहा है कि उनके पूर्वजों की जमीन अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह में भाग लेने की सजा के तौर पर जब्त की थी। आज भी गांव के कुछ परिवार उस ऐतिहासिक जमीन पर अपने अधिकार की मांग करते रहे हैं।

गांव का कुआं आज भी सुनाता है दर्दनाक कहानी

रोहनात में मौजूद एक पुराना कुआं भी इस इतिहास का महत्वपूर्ण प्रतीक है। स्थानीय परंपरा और कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अंग्रेजों की कार्रवाई के दौरान कई महिलाएं और ग्रामीण अपनी जान बचाने के लिए इस कुएं में कूद गए थे। गांव में यह स्थान आज भी उस दौर की त्रासदी की याद दिलाता है।

गांव में मौजूद बरगद का पेड़ भी शहीदों की स्मृति से जुड़ा बताया जाता है, जहां अंग्रेजों द्वारा लोगों को फांसी दिए जाने की घटनाओं का उल्लेख मिलता है।

आजादी के बाद भी क्यों कहा गया “गुलाम गांव”?

रोहनात की कहानी का सबसे अनोखा पहलू यही है। ग्रामीणों के बीच लंबे समय तक यह भावना रही कि जब तक उनके पूर्वजों से छीनी गई जमीन और ऐतिहासिक अन्याय का समाधान नहीं होता, तब तक उनकी आजादी अधूरी है।

इसी कारण रिपोर्टों के अनुसार, आजादी के बाद लंबे समय तक गांव में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा नहीं फहराया जाता था।हालांकि 23 मार्च 2018 को शहीद दिवस के अवसर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने रोहनात में तिरंगा फहराया। इसे गांव के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना गया।

संघर्ष आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ

आज रोहनात के लोग अपने गांव को केवल “बागियों का गांव” कहे जाने के बजाय “शहीदों का गांव” के रूप में पहचान दिलाने और जमीन से जुड़े पुराने विवादों के समाधान की मांग करते रहे हैं। 2023 में ग्रामीणों ने जमीन और गांव की ऐतिहासिक पहचान से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन भी किया था।

रोहनात की कहानी इस बात की याद दिलाती है कि देश की आजादी केवल 15 अगस्त 1947 की तारीख नहीं है। इसके पीछे हजारों गांवों और परिवारों के संघर्ष, बलिदान और ऐसी कई कहानियां हैं, जिनके निशान आज भी मौजूद हैं।

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